दरकार है एक ऐसे मित्र रूपी मित्र की,जो स्वार्थ से परे हो,
मन हो नीर सा निर्मल, विचार स्वर्ण से खरे हो,
जो समझ ले मेरी वो बातें,जो मैं ना कह पाता हूँ,
बांट ले वो मेरी सारी पीड़ा, जो अक्सर मैं सह जाता हूँ ।- दरकार है एक ऐसे चित्र रूपी मित्र की, जो रंगों से सरोबार हो,
जिसके हर प्रतिबिंब में, मेरे चरित्र का साक्षात्कार हो,
तस्वीर जिन्दगी की दोनों की, देखों तो लगे एक समान,
भेद करना मुश्किल हो कि कौन धरती और कौन आसमान । - दरकार है एक ऐसे इत्र रूपी मित्र की जिसकी महक कभी खुटे ना,
जो कोई छू ले एक बार उसे तो गंध उसकी छूटे ना,
उसके मित्र गंध के संपर्क में चंदन सी शीतलता हो,
पल भर की विरह में कस्तुरी मृग सी व्याकुलता हो । - दरकार है एक ऐसे पितृ रूपी मित्र की जिसका वैसा ही आधार हो,
जब कभी लड़खड़ाऊ मैं, हाथ थामने को तैयार हो,
मेरी कमियों को मुझे बताकर सही राह जो दिखलाए,
वक़्त आने पर पिता की भांति जीवन का अर्थ सिखलाए ।
*दिलीप जोशी की कलम से...✍*